आष्टा नगर पालिका में “परिवारवाद” का बोलबाला? नियम-कानून ताक पर, योग्य युवाओं के साथ खिलवाड़
आष्टा की आवाज़ / नवीन शर्मा
आष्टा। नगर पालिका आष्टा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला सीधे-सीधे भर्ती प्रक्रिया और “परिवारवाद” से जुडा हुआ बताया जा रहा है। आरोप हैं कि नगर पालिका में कर्मचारियों के पुत्रों, रिश्तेदारों और परिचितों को “सेटिंग” के जरिए नौकरी पर पिछले कई वर्षो से रखा जा रहा है, जबकि योग्य और पढ़े-लिखे युवा वर्षों से दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर पालिका में भर्ती का कोई पारदर्शी सिस्टम दिखाई नहीं देता। न कोई स्पष्ट विज्ञापन, न ही चयन की खुली प्रक्रिया—बस “अंदरखाने” तय हो जाता है कि किसे नौकरी देनी है। सूत्रों के अनुसार, कई मामलों में कर्मचारियों ने अपने ही बच्चों को पदों पर लगवा दिया, तो कहीं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के करीबी लोगों को प्राथमिकता दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या नगर पालिका अब “रोजगार का केंद्र” न होकर “परिवार का अड्डा” बनती जा रही है? यदि ऐसा है तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि उन हजारों युवाओं के साथ अन्याय भी है, जो कड़ी मेहनत कर योग्य बनने के बाद भी अवसर से वंचित हैं।
युवाओं में इस मुद्दे को लेकर गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार पारदर्शिता और मेरिट की बात करती है, वहीं स्थानीय स्तर पर नियम-कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। “अंधेर नगरी चौपट राजा” जैसी स्थिति बन गई है, जहां योग्यताएं नहीं, बल्कि पहचान और पहुंच ही नौकरी तय कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह मामला गंभीर जांच का विषय होना चाहिए। भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई जरूरी है।
अब बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उच्च प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या हाल ही में लगाए गए कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता, दस्तावेज और चयन प्रक्रिया की बारीकी से जांच होगी? यदि जांच होती है, तो यह साफ हो सकता है कि नियुक्तियां नियमों के तहत हुईं या फिर “सेटिंग-सिस्टम” के जरिए योग्यताओं को नजरअंदाज किया गया।
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
(यह मामला अब केवल एक नगर पालिका का नहीं, बल्कि सिस्टम की साख का सवाल बन चुका है।)

