आष्टा में विकास या “विनाश”? काला तालाब पर नगर पालिका की कार्यप्रणाली कटघरे में*

 


*आष्टा में विकास या “विनाश”? काला तालाब पर नगर पालिका की कार्यप्रणाली कटघरे में* 

👉 “ *कागजों में नियम, ज़मीन पर खेल?” — नए सत्ता पक्ष के नेता को लीज मिलने पर उठे सवाल* 

आष्टा की आवाज़ / नवीन शर्मा 


आष्टा का काला तालाब अब विकास से ज्यादा विवादों का केंद्र बन चुका है। लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई दुकानों को तोड़कर उसी जमीन को लीज पर देने का फैसला नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

नगर पालिका का दावा है कि टेंडर पूरी तरह नियम और कायदे के तहत हुआ। लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि यह लीज एक ऐसे सत्ताधारी दल से जुड़े नए चेहरे को मिली है, जो हाल ही में राजनीति में सक्रिय हुआ है। अब सवाल यह उठ रहा है कि:

क्या यह महज संयोग है, या फिर “सिस्टम” की मेहरबानी?

स्थानीय लोगों और व्यापारियों के बीच चर्चा है कि जिस व्यक्ति को यह लीज मिली, उसकी सक्रियता अचानक बढ़ी और उसी के बाद यह अहम जमीन उसके हाथ में चली गई। इससे पूरे टेंडर प्रोसेस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


व्यापारियों का आरोप है:

“हमें टेंडर की जानकारी ही नहीं दी गई। अगर खुली प्रक्रिया होती, तो हम ज्यादा कीमत देने को तैयार थे। यहां प्रतिस्पर्धा ही नहीं होने दी गई।”

अब सीधे सवाल नगर पालिका और व्यवस्था से:

क्या टेंडर प्रक्रिया वास्तव में प्रतिस्पर्धात्मक थी या सिर्फ औपचारिकता?

क्या सूचना जानबूझकर सीमित रखी गई?


 *क्या नए सत्ताधारी चेहरे को फायदा पहुंचाने के लिए पूरी प्रक्रिया मोड़ी गई?* 


 *पहले दुकानों का निर्माण और फिर तोड़फोड़—क्या यह पहले से तय खेल था?* 


 *मुख्य नगर पालिका अधिकारी का कहना है कि “सब कुछ नियमों के तहत हुआ”, लेकिन जनता अब नियमों से ज्यादा नीयत पर सवाल उठा रही है।* 


निष्कर्ष:

काला तालाब का मामला अब सिर्फ एक विकास कार्य नहीं रहा—यह नगर पालिका की पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता की परीक्षा बन गया है।

और सबसे बड़ा सवाल अभी भी हवा में है—

क्या यह विकास था… या पहले से तय खेल?”

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