आवास योजना की पहली किश्त का शोर, बाकी समस्याओं पर चुप्पी
524 हितग्राहीयों को किश्तें बांटीं, लेकिन आष्टा आज भी मूल सुविधाओं को तरस रहा
आष्टा की आवाज़ / नवीन शर्मा
आष्टा - नगरपालिका के कम्युनिटी हॉल में तालियों की गूंज और मंच से विकास की लंबी-लंबी कहानियां सुनाई गईं, लेकिन हॉल से बाहर निकलते ही वही टूटी सड़कें, वही गंदा पानी और वही अराजक व्यवस्था नगरवासियों का इंतज़ार कर रही थी। “चहूंओर विकास” के दावे एक बार फिर भाषणों तक सिमट कर रह गए।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 524 हितग्राहियों को पहली किश्त देकर इसे बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ पहली किश्त बांट देना ही सुशासन है? पिछली योजनाओं के लाभार्थी आज भी दूसरी-तीसरी किश्त के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। 31 मार्च तक मकान पूरा करने की नसीहत तो दे दी गई, पर महंगाई, निर्माण सामग्री के बढ़ते दाम और तकनीकी झंझटों पर परिषद पूरी तरह खामोश रही।
तालाबों के “सौंदर्यीकरण” का ढोल वर्षों से पीटा जा रहा है। तालाब आज भी अव्यवस्था, अतिक्रमण और गंदगी की मार झेल रहे हैं। सवाल साफ है—अगर काम चल रहा है तो जनता को नतीजा क्यों नहीं दिख रहा?
पार्वती नदी घाटों के जीर्णोद्धार और नए घाटों के वादे भी नए नहीं हैं। हर कार्यक्रम में इन्हें दोहराया जाता है, लेकिन नदी के किनारे हालात बद से बदतर हैं। बरसात आते ही सारा “विकास” बह जाता है।
खेल मैदान की रोशनी और दर्शकदीर्घा की बातें मंच पर खूब जमीं, मगर नगर के कई वार्ड आज भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। गलियों में न स्ट्रीट लाइट ठीक है, न सड़क, न नाली—पर फोटो खिंचवाने के लिए एक मैदान चमका दिया गया।
पेयजल संकट के स्थायी समाधान के नाम पर रामपुरा पाइपलाइन का राग भी वर्षो पुराना हो चुका है। तेजी से जारी काम आखिर कब पूरा होगा? जिन मोहल्लों में साफ पानी नहीं पहुंच रहा, उनके लिए कोई जवाब नहीं, सिर्फ आश्वासन हैं।
कार्यक्रम में मंचासीन नेताओं की लंबी कतार दिखी, लेकिन आम नागरिकों की पीड़ा मंच तक नहीं पहुंची। जाम, अतिक्रमण, अवैध कॉलोनियां, सड़कों पर बहता गंदा पानी—इन मुद्दों पर एक शब्द भी नहीं बोला गया।
अगर यही “चहूंओर विकास” है, तो जनता पूछ रही है—
नगरपालिका जनता की है या सिर्फ मंच और भाषणों की


