आष्टा में परीक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

 


आष्टा में परीक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

सरकारी स्कूलों को VIP सुविधा, अशासकीय विद्यार्थियों को भीड़ का दंड!

एक ही केंद्र पर परीक्षा देंगे सभी अशासकीय विद्यालय

शासकीय संदीपनि, मॉडल स्कूल व कन्या शाला को मिला पूरा-पूरा विद्यालय


आष्टा की आवाज़ / नवीन शर्मा


आष्टा। नगर में परीक्षा केंद्र निर्धारण को लेकर शिक्षा विभाग का ताज़ा आदेश अब समानता नहीं, सीधा भेदभाव बनकर सामने आ गया है। आदेश के अनुसार आष्टा के सभी अशासकीय विद्यालयों के विद्यार्थियों को एक ही परीक्षा केंद्र पर परीक्षा देने के लिए बाध्य कर दिया गया, जबकि शासकीय संदीपनि विद्यालय, शासकीय मॉडल स्कूल और शासकीय कन्या शाला को अलग-अलग पूरे विद्यालय में अकेले परीक्षा केंद्र उपलब्ध करा दिए गए।

यह फैसला न केवल अव्यवहारिक और असंतुलित है, बल्कि परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता, पारदर्शिता और बराबरी पर सीधा हमला है।

एक ओर सैकड़ों अशासकीय विद्यालयों के विद्यार्थी भीड़, अव्यवस्था और मानसिक दबाव में परीक्षा देने को मजबूर होंगे, वहीं दूसरी ओर चुनिंदा शासकीय विद्यालयों के छात्रों को शांत, सुव्यवस्थित और विशेष सुविधा वाला माहौल परोसा गया है।


❓  सवाल — जिनसे शिक्षा विभाग बच नहीं सकता


क्या परीक्षा व्यवस्था में समानता सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है?

क्या नियम और अनुशासन केवल अशासकीय विद्यालयों के लिए ही हैं?

क्या परीक्षा केंद्र निर्धारण में “सरकारी बनाम ग़ैरसरकारी” का पैमाना अपनाया गया?

एक ही नगर में दो अलग-अलग परीक्षा व्यवस्थाएं क्यों?

एक ही केंद्र पर अव्यवस्था या कदाचार हुआ तो ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

अशासकीय विद्यालयों की आपत्तियाँ रद्दी में फेंकी गईं

अशासकीय विद्यालय प्रबंधन का साफ कहना है कि एक ही केंद्र पर कई-कई विद्यालयों की परीक्षा कराने से अव्यवस्था, तनाव और नकल की आशंका कई गुना बढ़ जाती है, लेकिन इसके बावजूद उनकी आपत्तियों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर आदेश थमा दिए गए।

यह रवैया बताता है कि निर्णय शैक्षणिक हित में नहीं, बल्कि प्रशासनिक सहूलियत और पक्षपात की सोच से लिया गया है।


छात्र-अभिभावकों में उबाल


अभिभावकों का कहना है कि

“जब शासकीय संदीपनि, मॉडल स्कूल और कन्या शाला को पूरा-पूरा विद्यालय अकेले मिल सकता है, तो फिर हमारे बच्चों के साथ यह भेदभाव क्यों?”

यह मामला सिर्फ़ व्यवस्था का नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य, मानसिक दबाव और समान अवसर से जुड़ा है। इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।


नगर में चर्चा गर्म


नगर में अब यह चर्चा आम है कि यह फैसला

प्रशासनिक सुविधा के नाम पर किया गया खुला पक्षपात है

या फिर कुछ खास विद्यालयों पर दिखाई जा रही विशेष मेहरबानी?

यदि समय रहते इस आदेश में सुधार नहीं हुआ, तो यह मुद्दा शिक्षा विभाग के लिए बड़ा विवाद और आंदोलन का कारण बन सकता है।

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