जनशिक्षक नहीं ‘स्थायी कब्जाधारी’!

 


जनशिक्षक नहीं ‘स्थायी कब्जाधारी’!विभाग की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल 

आष्टाशिक्षा व्यवस्था को सुधारने का जिम्मा जिस विभाग पर है, वही अब खुद कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। जनशिक्षकों का कार्यकाल जहां स्पष्ट रूप से सिर्फ 3 वर्ष तय है, वहीं आष्टा क्षेत्र में कई जनशिक्षक वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं—और विभाग सब कुछ देखकर भी अनजान बना बैठा है।

👉 नियम कागजों में कैद, जमीन पर खुला खेल

सूत्र बताते हैं कि कई जनशिक्षक 5 से 8 साल से एक ही जगह पर डटे हुए हैं। नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ फाइलों की खानापूर्ति हो रही है।

👉 सीधे शिक्षा विभाग पर सवाल

अब सवाल साफ है—

क्या विभाग जानबूझकर इन्हें बचा रहा है?

क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग “सिस्टम” नहीं, बल्कि “सेटिंग” से तय हो रही है?

अगर नहीं, तो वर्षों से जमे इन चेहरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

👉 ‘सेटिंग-गेटिंग’ का संगठित खेल?

स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है कि कुछ जनशिक्षकों की पकड़ इतनी मजबूत है कि उनका स्थानांतरण “असंभव” हो चुका है।

अगर यह सच है, तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला है।

👉 नए शिक्षकों के साथ खुला अन्याय

जहां एक ओर योग्य और नए शिक्षक अवसर के इंतजार में हैं, वहीं पुराने चेहरे कुर्सियों पर स्थायी कब्जा जमाए बैठे हैं। इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

👉 विभाग की चुप्पी = मिलीभगत?

जिम्मेदार अधिकारियों की खामोशी अब सवालों को और गहरा कर रही है।

यह सिर्फ लापरवाही है या फिर सुनियोजित संरक्षण?

📢 अब जनता का सीधा सवाल —

“क्या शिक्षा विभाग खुद नियम तोड़ने वालों का संरक्षक बन गया है?”

👉 मांग तेज

✔ पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो

✔ वर्षों से जमे जनशिक्षकों की सूची सार्वजनिक हो

✔ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो


अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ हो जाएगा कि शिक्षा विभाग में नियम नहीं, बल्कि ‘रिश्ते और पहुंच’ ही सबसे बड़ा कानून हैं।

✍️ आष्टा की आवाज़

रिपोर्ट: नवीन शर्मा

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