“मान्यता की मंडी!”

 


“मान्यता की मंडी!”

शिक्षा विभाग में खुला खेल — नियम कागज़ों में, सौदे बंद कमरों में?

आष्टा की आवाज़/नवीन शर्मा

क्या अब स्कूल खोलने के लिए किताबों से ज्यादा जरूरी है “नोटों की गड्डी”? नगर और जिले में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जिन संस्थानों के पास न पर्याप्त भवन है, न योग्य स्टाफ, न सुरक्षा इंतज़ाम — वे भी मान्यता की मुहर हासिल कर लेते हैं।

कहने को नियम सख्त हैं — कक्षाओं का आकार, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, अग्नि सुरक्षा, योग्य शिक्षक… लेकिन हकीकत में कई स्कूल इन मानकों पर खरे नहीं उतरते। फिर भी फाइलें सरकती हैं, निरीक्षण “औपचारिक” होता है और आखिरकार मान्यता मिल जाती है।

सवाल सीधा है:

क्या यह सब अधिकारियों की नाक के नीचे हो रहा है या उनकी जानकारी में?

अभिभावक ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। वे मोटी फीस भरते हैं, लेकिन बच्चों को मिलती है अधूरी सुविधाएं। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यदि पैसों के दम पर नियम बदले जा रहे हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं — यह बच्चों के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ है।

जिला प्रशासन को चाहिए कि—

हाल ही में दी जा रही है उन सभी मान्यताओं की पुनः जांच कराई जाए।

निरीक्षण प्रक्रिया को सार्वजनिक और पारदर्शी बनाया जाए।

दोषी पाए जाने पर अधिकारियों और संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई हो।

अगर अभी भी आंखें मूंदी रहीं, तो आने वाली पीढ़ी इसकी कीमत चुकाएगी।

शिक्षा मंदिर है — इसे “मान्यता की मंडी” बनने से रोकना ही होगा।

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