श्रमदान से चमका तट, पर सिस्टम की सुस्ती से मैली पार्वती!

 


श्रमदान से चमका तट, पर सिस्टम की सुस्ती से मैली पार्वती!

नवीन शर्मा/आष्टा की आवाज़

आष्टा।नगर की जीवनदायिनी मानी जाने वाली पार्वती नदी के तट पर श्रमदान कार्यक्रम आयोजित कर साफ-सफाई का संदेश तो दिया गया, लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या एक दिन की मेहनत से सालभर की लापरवाही ढक जाएगी?

“जल ही जीवन है” और नदियाँ हमारी संस्कृति का आधार हैं—नपाध्यक्ष प्रतिनिधि रायसिंह मेवाड़ा ने यह बात कही। जागरूक नागरिकों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्लास्टिक व कचरा हटाकर तट को कुछ घंटों के लिए जरूर चमका दिया। फोटो खिंचे, संकल्प दोहराए गए, संदेश दिए गए।


लेकिन असली सवाल तस्वीरों से बाहर है।

सालभर नदी में गिरने वाले नालों का गंदा पानी, किनारों पर जमा गाद, प्लास्टिक की थैलियों के ढेर और खुलेआम फेंका जा रहा कचरा—इन सबकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या नगर पालिका की नियमित व्यवस्था इतनी कमजोर है कि नदी की सफाई अब जनभावना और प्रतीकात्मक श्रमदान के भरोसे छोड़ दी गई है?

नदी तटों की बदहाली यह संकेत देती है कि निगरानी और कार्ययोजना दोनों में गंभीर कमी है। यदि ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जलसंकट केवल चेतावनी नहीं, हकीकत बन सकता है।

श्रमदान के दौरान जनप्रतिनिधि और कर्मचारी मौजूद रहे, पर आमजन अब शब्दों से ज्यादा व्यवस्था में बदलाव देखना चाहते हैं।


जनता के सीधे सवाल हैं—

क्या यह अभियान नियमित और संरचित रूप लेगा?

क्या नदी में गिरने वाले नालों पर तकनीकी रोक लगेगी?

क्या प्लास्टिक उपयोग पर सख्त कार्रवाई होगी?

क्या दोषियों पर जुर्माना या दंडात्मक कदम उठेंगे?

जब तक इन सवालों के जवाब जमीन पर दिखाई नहीं देते, तब तक श्रमदान प्रतीकात्मक ही माना जाएगा।

नदी को सच में “जीवनदायिनी” बनाए रखना है तो दिखावे से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करनी होगी, बजट आवंटित करना होगा और नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित करनी होगी। वरना तट भले कुछ घंटों के लिए चमक जाए, लेकिन पार्वती फिर उसी मैल में डूबती 

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