पानी आधा, बिल पूरा—ऊपर से गंदा जल; सालों से नहीं हुई जांच!”

 



पानी आधा, बिल पूरा—ऊपर से गंदा जल; सालों से नहीं हुई जांच!”

 आष्टा की आवाज / नवीन शर्मा 

आष्टा। नगरपालिका की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। भीषण गर्मी के इस दौर में जहां आमजन पानी की एक-एक बूंद के लिए जूझ रहे हैं, वहीं नगर की जलापूर्ति व्यवस्था बदहाल होती नजर आ रही है। आरोप है कि पुरे नगर मे महज 15 दिन ही नलों में पानी आता है, लेकिन बिल पूरे महीने का वसूला जा रहा है।

स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है जब पानी की गुणवत्ता पर नजर डालते हैं। जिन क्षेत्रों में सप्लाई हो  रही है, वहां गंदा, मटमैला और बदबूदार पानी आने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यह पानी पीने योग्य तो दूर, घरेलू उपयोग के लिए भी सुरक्षित नहीं माना जा रहा, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

चौंकाने वाली बात यह है कि प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर में जल की गुणवत्ता जांच, विशेषकर पानी के पीएच मान (pH value) की जांच, पिछले कई वर्षों से नहीं करवाई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार पानी का पीएच संतुलित न होने पर यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद संबंधित विभाग की लापरवाही साफ नजर आ रही है।

स्थानीय स्तर पर नागरिकों का कहना है कि एक ओर अनियमित जलापूर्ति और दूसरी ओर दूषित पानी—दोहरी मार झेलने के बाद भी उन्हें पूरे महीने का बिल चुकाना पड़ रहा है। कई लोग मजबूरी में निजी टैंकरों से महंगे दामों पर साफ पानी खरीद रहे हैं।

इसी बीच, नगरपालिका द्वारा शहर में पक्षियों के लिए पानी के सकोरे (मिट्टी के बर्तन) वितरित करने का अभियान भी चर्चा में है। जहां इसे मानवीय पहल बताया जा रहा है, वहीं आमजन इसे “दिखावा” करार दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब शहरवासी खुद साफ पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब सकोरे बांटकर सुर्खियां बटोरना असल मुद्दों से ध्यान भटकाने जैसा है।

एक स्थानीय निवासी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “आधा महीना पानी नहीं आता, और जब आता है तो गंदा आता है। वर्षों से पानी की जांच तक नहीं हुई, फिर भी पूरा बिल लिया जा रहा है। ये जनता के साथ सीधा अन्याय है।”

नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि जलापूर्ति को नियमित किया जाए, पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच सुनिश्चित की जाए और बिलिंग प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए।

अब देखने वाली बात यह होगी कि नगरपालिका इस गंभीर मुद्दे पर कब तक ठोस कदम उठाती है या फिर “सकोरा अभियान” के सहारे ही सुर्खियां बटोरती रहेगी।

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